ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन का अमेरिकी जनता को सीधा संदेश और इसके मायने

ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन का अमेरिकी जनता को सीधा संदेश और इसके मायने

ईरान के नए राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन ने सीधे तौर पर अमेरिकी जनता को संबोधित करके सबको चौंका दिया है। ये कोई सामान्य कूटनीतिक पत्र नहीं है। उन्होंने साफ कहा कि ईरान की दुश्मनी अमेरिका के लोगों से नहीं बल्कि वहां की सरकार की नीतियों से है। जब कोई देश सालों से कड़े आर्थिक प्रतिबंधों (Sanctions) की मार झेल रहा हो, तब उसका मुखिया ऐसी भाषा इस्तेमाल करे तो दुनिया के कान खड़े होना लाजमी है। पेज़ेश्कियन का यह कदम दिखाता है कि वो ईरान की छवि को वैश्विक मंच पर बदलने की गंभीर कोशिश कर रहे हैं।

ईरान और अमेरिका के बीच का तनाव दशकों पुराना है। 1979 की क्रांति के बाद से ही दोनों के रिश्तों में खटास रही है। लेकिन पिछले कुछ सालों में, खासकर 2018 में जब ट्रंप प्रशासन ने परमाणु समझौते (JCPOA) से हाथ खींचे, हालात बद से बदतर हो गए। पेज़ेश्कियन अब इसी खाई को पाटने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उनका तरीका पारंपरिक राजनीति से हटकर है।

वाशिंगटन नहीं बल्कि आम अमेरिकियों से बात

ईरान के राष्ट्रपति जानते हैं कि अमेरिकी सरकार के साथ मेज पर बैठना अभी मुश्किल है। इसलिए उन्होंने जनता की अदालत का रुख किया। पत्र में उन्होंने यह समझाने की कोशिश की है कि ईरान एक शांतिप्रिय देश है जो सिर्फ अपनी संप्रभुता की रक्षा करना चाहता है। उन्होंने इजरायल-हमास युद्ध और मिडिल ईस्ट की अस्थिरता का भी जिक्र किया। पेज़ेश्कियन का तर्क है कि अमेरिका की बाहरी दखलअंदाजी ही इन समस्याओं की जड़ है।

ये बात समझने वाली है कि वो ऐसा क्यों कर रहे हैं। ईरान की अर्थव्यवस्था इस वक्त वेंटिलेटर पर है। महंगाई आसमान छू रही है और रियाल (Rial) की कीमत गिरती जा रही है। पेज़ेश्कियन को पता है कि जब तक प्रतिबंध नहीं हटेंगे, वो अपने देश के युवाओं को बेहतर भविष्य नहीं दे पाएंगे। अमेरिकियों को लिखे इस पत्र के पीछे की असली मंशा वहां के जनमत को प्रभावित करना है, ताकि आने वाले समय में व्हाइट हाउस पर नीति बदलने का दबाव बने।

क्या ये सिर्फ एक दिखावा है या बदलाव की आहट

दुनिया के कई राजनीतिक विश्लेषक इसे महज एक 'पब्लिक रिलेशन एक्सरसाइज' मान रहे हैं। लेकिन पेज़ेश्कियन की पृष्ठभूमि को देखें तो वो एक सुधारवादी नेता के रूप में उभरे हैं। उन्होंने चुनाव के दौरान भी पश्चिमी देशों के साथ संवाद बढ़ाने की बात कही थी। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौन सहमति के बिना ऐसा पत्र लिखा जाना मुमकिन नहीं है। इसका मतलब है कि ईरान का सत्ता प्रतिष्ठान अब बातचीत के लिए दरवाजे खोल रहा है।

हालांकि, रास्ता इतना आसान नहीं है। अमेरिका में चुनावी माहौल है और कोई भी पार्टी ईरान के प्रति नरम रुख अपनाकर रिस्क नहीं लेना चाहती। पेज़ेश्कियन ने पत्र में स्पष्ट किया कि वो दबाव में झुकेंगे नहीं। सम्मान के साथ संवाद उनकी पहली शर्त है। उन्होंने साफ लफ्जों में लिखा कि ईरान ने कभी युद्ध नहीं चाहा, लेकिन अपनी सुरक्षा के साथ समझौता भी नहीं करेगा।

मध्य पूर्व की राजनीति पर इसका असर

अगर ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत का कोई भी सिरा जुड़ता है, तो इसका सबसे बड़ा असर इजरायल और सऊदी अरब जैसे देशों पर पड़ेगा। ईरान समर्थित गुटों (जैसे हिजबुल्लाह और हूतियों) की सक्रियता ने पहले ही क्षेत्र को बारूद के ढेर पर खड़ा कर दिया है। पेज़ेश्कियन का पत्र संकेत देता है कि वो टकराव की जगह स्थिरता चाहते हैं।

ईरानी राष्ट्रपति ने अपने संदेश में गाजा के हालातों का भी जिक्र किया। उन्होंने इसे मानवाधिकारों का हनन बताया। ये दरअसल ग्लोबल साउथ के देशों को अपनी ओर खींचने की एक रणनीति है। वो दिखाना चाहते हैं कि ईरान सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि न्याय के लिए खड़ा है।

ईरान की नई विदेश नीति के संकेत

पेज़ेश्कियन का ये कदम उनकी 'ईरान फर्स्ट' नीति का हिस्सा लगता है। वो जानते हैं कि रूस और चीन के साथ नजदीकी बढ़ाने के बावजूद, ईरान को वैश्विक वित्तीय तंत्र में लौटने के लिए पश्चिम के साथ तालमेल बिठाना ही होगा। ये पत्र उसी लंबी प्रक्रिया की पहली ईंट है।

ईरान के भीतर भी दो फाड़ हैं। कट्टरपंथी तबका अभी भी अमेरिका को 'बड़ा शैतान' मानता है। पेज़ेश्कियन को घर के भीतर इन ताकतों को संभालना है और बाहर अपनी साख जमानी है। ये एक खतरनाक खेल है जिसमें जरा सी चूक उन्हें राजनीतिक रूप से कमजोर कर सकती है।

हमें इस घटनाक्रम को कैसे देखना चाहिए

ईरान के राष्ट्रपति का ये पत्र किसी भी तरह की कमजोरी का संकेत नहीं है। ये एक मंजे हुए राजनेता की चाल है जो युद्ध की भाषा छोड़कर कूटनीति के मैदान में बाजी मारना चाहता है। उन्होंने गेंद अब अमेरिका के पाले में डाल दी है। क्या अमेरिकी जनता अपनी सरकार से ईरान के प्रति नरम रवैया अपनाने की मांग करेगी? इसकी संभावना कम है, लेकिन संवाद की एक नई खिड़की जरूर खुली है।

आने वाले महीनों में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) जैसी बैठकों में पेज़ेश्कियन का रुख और साफ होगा। अगर आप वैश्विक राजनीति पर नजर रखते हैं, तो ईरान के इन छोटे-छोटे बदलावों को समझना जरूरी है। ये सिर्फ एक पत्र नहीं, बल्कि एक नई क्षेत्रीय व्यवस्था की कोशिश है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्टिंग पर ध्यान दें और देखें कि क्या अमेरिका की ओर से कोई आधिकारिक या अनौपचारिक प्रतिक्रिया आती है। फिलहाल, ईरान ने अपना पत्ता चल दिया है। अब बारी वाशिंगटन की है।

NH

Naomi Hughes

A dedicated content strategist and editor, Naomi Hughes brings clarity and depth to complex topics. Committed to informing readers with accuracy and insight.