सूडान की राजधानी के पास एक अस्पताल पर ड्रोन हमला हुआ और देखते ही देखते 12 लोगों की जान चली गई। यह कोई आकस्मिक घटना नहीं है। यह युद्ध अपराधों की उस लंबी फेहरिस्त का हिस्सा है जिसे दुनिया खामोशी से देख रही है। जब अर्धसैनिक बल रैपिड सपोर्ट फोर्सेज (RSF) ने अल-दमन अस्पताल को निशाना बनाया, तो उन्होंने सिर्फ एक इमारत को नहीं बल्कि उन चंद जगहों में से एक को तबाह किया जहाँ लोग अब भी सुरक्षित महसूस करने की कोशिश कर रहे थे। इस हमले में 22 लोग घायल हुए हैं और उनमें से कइयों की हालत ऐसी है कि मौत का आंकड़ा बढ़ना तय है।
अस्पताल अब सुरक्षित ठिकाने नहीं रहे
युद्ध के अपने नियम होते हैं। अंतरराष्ट्रीय कानूनों के हिसाब से अस्पताल, स्कूल और रिहायशी इलाके नो-गो ज़ोन होने चाहिए। लेकिन सूडान के गृहयुद्ध ने इन सारे कायदों को कूड़ेदान में डाल दिया है। आरएसएफ के इस ड्रोन हमले ने साबित कर दिया कि अब कहीं भी सुरक्षित महसूस करना एक भ्रम है। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि धमाका इतना तेज था कि अस्पताल की छत का एक हिस्सा गिर गया। वार्डों में खून और मलबे के सिवा कुछ नहीं बचा।
यह हमला उत्तरी दारफुर या खार्तूम के बाहरी इलाकों में बढ़ती हिंसा का नतीजा है। आरएसएफ और सूडानी सेना (SAF) के बीच चल रही सत्ता की इस जंग में आम नागरिक सिर्फ 'कोलेटरल डैमेज' बनकर रह गए हैं। आप कल्पना कीजिए, आप अपने किसी बीमार रिश्तेदार का इलाज कराने गए हैं और वहां से लाशें निकलती हैं। यह भयावह है। सच तो यह है कि सूडान का स्वास्थ्य ढांचा पहले ही वेंटिलेटर पर था, और ऐसे हमले उसे पूरी तरह खत्म कर रहे हैं।
ड्रोन तकनीक ने युद्ध को और गंदा बना दिया है
आजकल युद्ध में ड्रोन का इस्तेमाल बढ़ गया है क्योंकि ये सस्ते हैं और दूर बैठे ऑपरेटर को खतरे में डाले बिना हमला करने की सुविधा देते हैं। सूडान के इस मामले में भी यही हुआ। आरएसएफ ने सटीक निशाना साधा। इससे साफ पता चलता है कि उनके पास अब आधुनिक तकनीक पहुँच रही है। सवाल यह है कि इन्हें ये हथियार मिल कहाँ से रहे हैं?
हथियारों की यह सप्लाई चेन ही इस युद्ध को लंबा खींच रही है। जब तक विदेशी ताकतें अपने हितों के लिए इन गुटों को खाद-पानी देती रहेंगी, तब तक अल-दमन जैसे अस्पतालों पर बम गिरते रहेंगे। लोग मरते रहेंगे। दुनिया निंदा करती रहेगी। बस यही चक्र चलता रहेगा। सच कहूँ तो, अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चुप्पी चुभने वाली है। यूक्रेन या गाजा पर जो शोर मचता है, उसका 10% भी सूडान के लिए नहीं दिखता। क्या वहां की जानों की कीमत कम है?
स्वास्थ्य सेवाओं पर हमले का दूरगामी असर
जब एक अस्पताल तबाह होता है, तो सिर्फ उस दिन मरने वाले 12 लोग ही नुकसान नहीं होते। नुकसान होता है उन हजारों लोगों का जो अगले कई महीनों तक वहां इलाज नहीं करा पाएंगे।
- डॉक्टर और नर्सें इलाका छोड़कर भाग रहे हैं क्योंकि उन्हें अपनी जान का डर है।
- दवाइयों का स्टॉक या तो लूट लिया जाता है या मलबे में दब जाता है।
- गर्भवती महिलाओं और बच्चों के लिए टीकाकरण और बुनियादी देखभाल पूरी तरह बंद हो चुकी है।
सूडान के कई हिस्सों में अब एक भी वर्किंग हॉस्पिटल नहीं बचा है। लोग छोटी-छोटी बीमारियों से मर रहे हैं क्योंकि इलाज की सुविधा ही खत्म कर दी गई है। यह एक सोची-पूंजी रणनीति का हिस्सा लगता है—जनता को इतना मजबूर कर दो कि वे सरेंडर कर दें। लेकिन इसमें पिस तो वो मासूम रहे हैं जिनका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं।
क्या अब भी कोई उम्मीद बची है
कहने को तो बहुत कुछ है, पर ज़मीनी हकीकत डरावनी है। संयुक्त राष्ट्र और अन्य मानवाधिकार संगठन बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि सूडान अकाल और महामारी की कगार पर खड़ा है। 12 लोगों की मौत सिर्फ एक हेडलाइन नहीं है। यह उस सिस्टम की नाकामी है जिसे हम 'ग्लोबल ऑर्डर' कहते हैं।
अगर आप इस खबर को पढ़कर सिर्फ दुख जता रहे हैं, तो समझिए कि समस्या कितनी गहरी है। हमें उन संगठनों का साथ देना होगा जो अब भी वहां ज़मीन पर काम कर रहे हैं, जैसे डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (MSF)। वे ही हैं जो इन गोलियों और ड्रोनों के बीच लोगों की जान बचा रहे हैं।
तत्काल प्रभाव से सूडान में युद्धविराम की ज़रूरत है। इसके बिना, हम बस अगली किसी ऐसी ही रिपोर्ट का इंतज़ार करेंगे जहाँ मरने वालों की संख्या 12 से बढ़कर 20 या 50 हो जाएगी। दुनिया को जागना होगा, वरना सूडान एक ऐसा कब्रिस्तान बन जाएगा जहाँ कोई आंसू बहाने वाला भी नहीं बचेगा। अभी कदम उठाना ज़रूरी है। हथियारों की सप्लाई पर प्रतिबंध लगाइए और युद्ध अपराधियों को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के कटघरे में खड़ा कीजिए। इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है।