केन्या में प्रकृति का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है। मूसलाधार बारिश ने पूरे देश में तबाही मचा रखी है। ताजा रिपोर्टों के मुताबिक अब तक 8 लोगों की जान जा चुकी है। यह केवल एक संख्या नहीं है। ये वे परिवार हैं जिन्होंने अपने अपनों को खोया है। सड़कों पर सैलाब है और घरों में कीचड़। जब हालात प्रशासन के नियंत्रण से बाहर होने लगे, तो सरकार को सेना उतारनी पड़ी। केन्या डिफेंस फोर्सेज (KDF) अब उन इलाकों में मोर्चा संभाले हुए है जहाँ पहुंचना आम बचाव दल के लिए नामुमकिन हो गया था।
यह स्थिति अचानक पैदा नहीं हुई। हिंद महासागर में बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन के असर ने पूर्वी अफ्रीका को इस मोड़ पर ला खड़ा किया है। पिछले कुछ हफ्तों से जारी बारिश ने इंफ्रास्ट्रक्चर की पोल खोल दी है। नैरोबी से लेकर तटीय इलाकों तक, हर जगह पानी का कब्जा है। लोग छतों पर शरण लेने को मजबूर हैं।
सेना का रेस्क्यू ऑपरेशन और चुनौतीपूर्ण हालात
जब पानी का स्तर खतरे के निशान को पार कर गया, तो राष्ट्रपति विलियम रूटो ने सेना को सक्रिय होने का आदेश दिया। सेना के हेलीकॉप्टर अब उन क्षेत्रों में भोजन और दवाइयां पहुंचा रहे हैं जो पूरी तरह कट चुके हैं। टाना नदी के आसपास का इलाका सबसे ज्यादा प्रभावित है। यहाँ नदी का तटबंध टूटने से दर्जनों गांव जलमग्न हो गए।
सैनिकों के लिए भी यह काम आसान नहीं है। तेज हवाओं और लगातार गिरते पानी के बीच उड़ान भरना जोखिम भरा है। इसके बावजूद, सेना ने अब तक सैकड़ों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया है। निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को जबरन निकाला जा रहा है क्योंकि वे अपना घर छोड़ने को तैयार नहीं थे। जान बचाना पहली प्राथमिकता है। माल-मत्ता तो बाद में भी कमाया जा सकता है।
मौत के आंकड़े और मलबे में दबी जिंदगी
आधिकारिक तौर पर 8 मौतों की पुष्टि हुई है, लेकिन स्थानीय लोगों का मानना है कि यह संख्या बढ़ सकती है। कई लोग अभी भी लापता हैं। भूस्खलन ने कई कच्चे मकानों को ताश के पत्तों की तरह ढहा दिया। मध्य केन्या के पहाड़ी इलाकों में मिट्टी धंसने की घटनाएं सबसे ज्यादा हुई हैं। वहां बचाव कार्य में लगी मशीनों को पहुंचने में घंटों लग रहे हैं क्योंकि रास्ते बह चुके हैं।
केन्या रेड क्रॉस के मुताबिक, हजारों लोग बेघर हो गए हैं। स्कूल और चर्च अब राहत शिविरों में बदल चुके हैं। वहां भी सुविधाओं का अभाव है। पीने के साफ पानी की कमी सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। बाढ़ के पानी में सीवेज मिलने से हैजा और अन्य जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। प्रशासन को अब केवल बाढ़ से नहीं, बल्कि आने वाली महामारियों से भी लड़ना होगा।
आखिर क्यों डूब रहा है केन्या
हम अक्सर इसे केवल 'भारी बारिश' कहकर टाल देते हैं। पर सच इससे कहीं ज्यादा कड़वा है। शहरी नियोजन में भारी कमी और नालियों की सफाई न होना मुख्य कारण हैं। नैरोबी जैसे बड़े शहर में भी पानी निकलने का रास्ता नहीं है। कंक्रीट के जंगल ने जमीन की पानी सोखने की क्षमता खत्म कर दी है।
जलवायु विशेषज्ञों का कहना है कि अल-नीनो का प्रभाव इस बार उम्मीद से ज्यादा घातक है। हिंद महासागर का द्विध्रुव (Dipole) सकारात्मक होने के कारण इस क्षेत्र में नमी वाली हवाएं ज्यादा आ रही हैं। इससे बारिश की तीव्रता बढ़ गई है। सरकार ने पहले चेतावनी तो जारी की थी, लेकिन जमीन पर तैयारी शून्य थी। लोग बेखौफ नदियों के किनारे बसे रहे और अब कीमत चुका रहे हैं।
क्या सावधानी बरतनी जरूरी है
अगर आप प्रभावित इलाकों में हैं या वहां आपके परिचित रहते हैं, तो कुछ बातें गांठ बांध लें। बहते पानी को पार करने की कोशिश बिल्कुल न करें। महज छह इंच का तेज बहाव आपको गिरा सकता है और दो फीट पानी कार को बहा ले जा सकता है। बिजली के खंभों से दूर रहें। इस समय करंट लगने की घटनाएं बहुत हो रही हैं।
- रेडियो या मोबाइल पर मौसम विभाग के अपडेट्स सुनते रहें।
- एक 'गो-बैग' तैयार रखें जिसमें जरूरी दस्तावेज, दवाइयां और टॉर्च हो।
- ऊंचे स्थानों पर चले जाएं और सरकारी निर्देशों का इंतजार न करें।
खेती और अर्थव्यवस्था पर तगड़ी चोट
केन्या की अर्थव्यवस्था कृषि पर टिकी है। हजारों एकड़ में लगी फसलें बर्बाद हो गई हैं। चाय और कॉफी के बागानों को भी नुकसान पहुंचा है। इसका सीधा असर आने वाले महीनों में खाद्य कीमतों पर पड़ेगा। महंगाई पहले से ही आसमान छू रही है और अब यह आपदा कोढ़ में खाज का काम करेगी।
पशुपालकों की स्थिति और भी बदतर है। मवेशी बाढ़ में बह गए हैं। उत्तरी केन्या में, जहाँ पहले सूखा था, अब बाढ़ ने सब कुछ खत्म कर दिया है। यह विरोधाभास ही जलवायु परिवर्तन की असल पहचान है। कभी पानी की बूंद को तरसना और कभी उसी पानी में डूब जाना।
मदद के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदायों से भी अपील की गई है। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियां और अन्य एनजीओ ग्राउंड पर काम कर रहे हैं। फिलहाल ध्यान केवल जान बचाने पर है। पुनर्निर्माण की प्रक्रिया लंबी और खर्चीली होने वाली है। सरकार को अब ड्रेनेज सिस्टम और आपदा प्रबंधन पर नए सिरे से सोचना होगा। केवल सेना के भरोसे हर साल नहीं बचा जा सकता।
सरकारी एजेंसियों को चाहिए कि वे प्रभावित परिवारों को तुरंत नकद सहायता और सूखा राशन उपलब्ध कराएं। जलभराव वाले क्षेत्रों में मच्छरों को पनपने से रोकने के लिए दवा का छिड़काव शुरू करना चाहिए। स्थानीय नागरिक भी अपने स्तर पर शेल्टर होम में वॉलंटियर कर सकते हैं। एकजुटता ही इस संकट से निकलने का एकमात्र रास्ता है।